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मायावती का उत्तराधिकारी कौन? कतार में कई बड़े चेहरे, पर माया का इशारा किसकी ओर?

लखनऊ. बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमो और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती अगले साल 15 जनवरी को 71 साल की हो जाएंगी। हर साल मायावती अपना जन्मदिन कुछ खास करके मनाती हैं। इस दिन लखनऊ में पार्टी कार्यकर्ताओं का जमावड़ा लगता है, जहां मायावती अपने जोशीले भाषणों से उनमें जोश भरती हैं। यह रिवाज कई सालों से चला आ रहा है, लेकिन जब चुनाव के नतीजों की बात आती है तो अक्सर निराशा ही हाथ लगती है। 2027 के UP विधानसभा चुनावों के ऐलान से ठीक पहले, मायावती एक बार फिर 15 जनवरी 2027 को अपना 71वां जन्मदिन मनाएंगी और इस मौके पर कोई बड़ा ऐलान करेंगी। लेकिन इन सबके बीच एक बड़ा सवाल हमेशा गूंजता रहता है: BSP में मायावती का वारिस कौन होगा? मायावती ने अभी तक किसी को अपना वारिस घोषित नहीं किया है। हालांकि वह कभी-कभी इस ओर इशारा करती हैं लेकिन जिसे भी आगे बढ़ाती हैं, उसे अपनी जगह भी दिखा देती हैं।

देश की राजनीति में, बहुजन समाज पार्टी एक ऐसी संस्था रही है जिसका मैनेजमेंट और पहचान एक ही नाम के इर्द-गिर्द घूमती है: “बहन कुमारी मायावती।” जब 1984 में कांशीराम की देखरेख में BSP बनी तो मायावती खुद एक आक्रामक दलित और महिला नेता के तौर पर उभरीं। हालांकि 2003 में पार्टी का पूरा मैनेजमेंट संभालने के बाद से मायावती के पैरेलल कोई दूसरा दलित नेता युवा हस्ती या महिला नेता BSP के अंदर अपनी राजनीतिक जड़ें नहीं जमा पाया है। राजनीतिक जानकारों का मानना ​​है कि BSP का संगठनात्मक ढांचा पूरी तरह से कंट्रोल के सिद्धांत पर चलता है। पार्टी के अंदर मायावती के फैसले पक्के और पक्के होते हैं। जब मायावती पार्टी नेताओं के साथ मीटिंग करती हैं तो उनके बाएं या दाएं कोई कुर्सी नहीं रखी जाती है। मायावती की कुर्सी की ऊंचाई हमेशा उनके सामने रखी कुर्सियों की ऊंचाई से ऊंची होती है। चाहे सतीश चंद्र मिश्रा हों या उनके भतीजे आकाश आनंद, सबकी कुर्सियां ​​मायावती की कुर्सी के सामने रखी जाती हैं।

पिछले 10-15 सालों में BSP में अंदर-बाहर की पॉलिटिक्स

पिछले 10-15 सालों में BSP के अंदर जो भी लीडर उभरा, वही बाहर हो गया। BSP के इतिहास में एक साफ़ पैटर्न देखा गया है: जिस भी लीडर ने मायावती जैसा पर्सनल सपोर्ट बेस या मीडिया में असर बनाना शुरू किया उसे अनुशासनहीनता या पार्टी विरोधी कामों का हवाला देकर बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। स्वामी प्रसाद मौर्य और नसीमुद्दीन सिद्दीकी, सभी का यही हश्र हुआ है। ये लीडर जो 2012 तक पार्टी में बड़े OBC और मुस्लिम चेहरे थे पार्टी के सत्ता खोते ही उन्हें जाने या निकालने पर मजबूर होना पड़ा। इंद्रजीत सरोज और लालजी वर्मा जैसे बड़े दलित और पिछड़े वर्ग के लीडर जिन्होंने BSP के ज़मीनी कैडर को तैयार किया उन्हें साइडलाइन कर दिया गया और बाद में वे दूसरी पार्टियों में शामिल हो गए। दानिश अली और राम अचल राजभर जिन्होंने पार्लियामेंट और संगठन में अपनी बात रखी उन्हें भी समय-समय पर निकाला गया।

मायावती की यह अंदर-बाहर की पॉलिटिक्स कैडर को सीधा मैसेज देती है। पार्टी सिर्फ़ बहनजी के नाम और विश्वास पर चलती है, किसी खास व्यक्ति पर नहीं। BSP में मायावती के अलावा किसी और महिला नेता की कमी सामने आने का पहला कारण पार्टी का अंदरूनी काम करने का तरीका है। BSP ने कभी भी ऑफिशियली कोई दूसरा सबसे बड़ा नेता या नंबर-दो का पद तय नहीं किया। जो भी इस पद के करीब आया उसे पार्टी से निकाल दिया गया।

मायावती खुद को देश की इकलौती दलित महिला नेता के तौर पर पहचान बनाना चाहती हैं। किसी दूसरी महिला नेता को प्रवक्ता या नेशनल चेहरा बनने का मौका नहीं दिया गया ताकि बहुजन वोट बैंक का ध्यान दूसरे चेहरों की तरफ न जाए। क्या बहनजी के प्रति कैडर की एकतरफा वफादारी इसकी वजह है? BSP के पारंपरिक दलित वोटरों ने हमेशा मायावती को सीधे वोट दिया है किसी लोकल नेता को नहीं। इससे लोकल नेताओं को अपना सपोर्ट बेस बनाने में रुकावट आती है।

आकाश आनंद बार-बार अंदर-बाहर क्यों हो रहे हैं?

जब मायावती के भतीजे आकाश आनंद को पार्टी के नेशनल कोऑर्डिनेटर के तौर पर आगे लाया गया, तो ऐसा लगा कि BSP में पहली बार वारिस तय हो रहा है। लेकिन उनके आक्रामक भाषणों और बढ़ते असर के बीच मायावती ने उन्हें पद से हटा दिया और बाद में उन्हें दूसरी जगह दे दी। आकाश आनंद के फेरबदल और उनके भाई ईशान आनंद की एंट्री की हालिया खबरों से यह सवाल उठ रहे हैं कि क्या आकाश का भी वही हाल होगा जो पुराने नेताओं का हुआ है।

पॉलिटिकल जानकारों का मानना ​​है कि मायावती आकाश आनंद की पॉलिटिकल मैच्योरिटी को अपनाना चाहती हैं। जब भी आकाश पार्टी की पारंपरिक बैलेंस्ड लाइन से भटकते हैं या मीडिया में बहुत ज़्यादा एक्टिव हो जाते हैं, तो मायावती उन्हें साइडलाइन कर देती हैं, जिससे यह मैसेज जाता है कि ग्रुप में कोई भी उनके फैसलों से ऊपर नहीं है, भले ही वे परिवार के सदस्य ही क्यों न हों।

2027 के उत्तर प्रदेश चुनावों के लिए BSP की स्ट्रैटेजी क्या है?

2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के लिए BSP की स्ट्रैटेजी में बड़े बदलाव के संकेत मिल रहे हैं। ऐसा लगता है कि BSP किसी बड़े अलायंस में शामिल होने के बजाय अकेले चुनाव लड़ने की अपनी स्ट्रैटेजी पर टिकी हुई है। पार्टी अपने खोए हुए जाटव और गैर-जाटव दलित वोट बैंक को वापस पाने पर फोकस कर रही है। मायावती 2007 का जीत का इक्वेशन फिर से बनाने के लिए एक बार फिर दलित-ब्राह्मण और मुस्लिम भाईचारा कमेटियों को एक्टिव कर रही हैं।

जाने-माने लोगों के बजाय मायावती अब ज़िला-लेवल और सेक्टर इंचार्ज को प्रमोट कर रही हैं जिनकी अपनी कोई पॉलिटिकल हैसियत नहीं है और वे सिर्फ़ सेंट्रल मैनेजमेंट के प्रति जवाबदेह हैं। मायावती के पॉलिटिकल स्टाइल से यह साफ़ है कि BSP में हमेशा सिर्फ़ एक ही चेहरा रहेगा: कुमारी मायावती। हालांकि आने वाले सालों में इस उम्र में मायावती शायद BSP की कमान अपने भतीजों आकाश आनंद या ईशान आनंद में से किसी एक को सौंप देंगी या वह किसी दलित महिला को आगे बढ़ाएंगी जैसा कांशीराम ने किया था। फिलहाल, मायावती और BSP के मॉडल में ऐसा कुछ भी शामिल नहीं दिखता है।

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