लखनऊ: लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे के निर्माण में गंभीर लापरवाही और खराब गुणवत्ता के आरोपों के बाद विवादों में आई कंपनी पीएनसी इंफ्राटेक (PNC Infratech) को लेकर एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। एक तरफ जहां भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने सख्त कदम उठाते हुए कंपनी को तीन साल के लिए ब्लैकलिस्ट (प्रतिबंधित) कर दिया है, वहीं दूसरी तरफ लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) ने कंपनी को करोड़ों रुपये का एक नया प्रोजेक्ट सौंप दिया है।
इस मामले पर एलडीए के अधिकारियों का कहना है कि एनएचएआई द्वारा लगाया गया प्रतिबंध केवल उनके अपने राष्ट्रीय राजमार्गों और केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय (MoRTH) की बोलियों पर लागू होता है। यह रोक राज्य सरकार या स्थानीय विकास प्राधिकरण जैसे एलडीए के प्रोजेक्ट्स पर प्रभावी नहीं है। नियमानुसार, जो भी कंपनी सबसे कम बोली लगाती है और तकनीकी मापदंडों को पूरा करती है, उसे ही काम दिया जाता है।
हाल ही में करीब 4,200 करोड़ रुपये की लागत से बने 63 किलोमीटर लंबे लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे का उद्घाटन किया गया था। लेकिन उद्घाटन के महज कुछ ही दिनों के भीतर एक्सप्रेसवे के कई हिस्सों में सड़क धंसने, बड़ी-बड़ी दरारें आने और एलिवेटेड हिस्से से कंक्रीट गिरने जैसी गंभीर तकनीकी खामियां सामने आ गईं।
यह मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच तक पहुंच गया। इस पर संज्ञान लेते हुए NHAI ने कंपनी को ‘नॉन-परफॉर्मर’ घोषित कर 11 सितंबर 2026 को एक आदेश जारी किया, जिसके तहत पीएनसी इंफ्राटेक और उसकी सहायक कंपनी अवध एक्सप्रेसवे को तीन साल के लिए NHAI और सड़क परिवहन मंत्रालय की किसी भी नई परियोजना की बोली लगाने से प्रतिबंधित कर दिया गया।
NHAI के इस बड़े एक्शन के बावजूद लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) ने पीएनसी इंफ्राटेक को एक नया ठेका दे दिया। दरअसल, एलडीए ने शहीद पथ इंटरसेक्शन पर गोमती नदी के दाहिने किनारे ग्रीन कॉरिडोर को जोड़ने के लिए चार लेन के फ्लाईओवर, दो लूप और दो रैंप के निर्माण के लिए 215.65 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत का एक टेंडर आमंत्रित किया था।
इस परियोजना की वित्तीय बोली (Financial Bid) में पीएनसी इंफ्राटेक ने सबसे कम 194.40 करोड़ रुपये की बोली लगाकर लोएस्ट बिडर का स्थान हासिल किया। तकनीकी रूप से पात्र पाए जाने और सबसे कम बोली होने के कारण एलडीए द्वारा इस प्रोजेक्ट को पीएनसी को आवंटित करने की प्रक्रिया की जानी है।
इस प्रोजेक्ट को दो साल की समय सीमा के भीतर पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। बहरहाल, एनएचएआई द्वारा बैन की गई कंपनी को शहर के एक महत्वपूर्ण फ्लाईओवर का जिम्मा सौंपने के एलडीए के इस फैसले ने जनता के बीच नई बहस छेड़ दी है।