“हमको अनदेखा करके सवारी ई रिक्शा की ओर चली जाती है, क्योंकि सबको पहुँचने की जल्दी है।” ये कहना है मोहम्मद रईस का। रईस सुबह से लखनऊ के लालबाग एल. डी. ए. कोर्ट के गेट पर अपने साइकिल रिक्शा के साथ खड़े है। दिन के दो बज रहे है। पूछने पर बताते हैं कि अभी तक सिर्फ एक सवारी मिली है।
मोहम्मद रईस नवाबों की नगरी लखनऊ के आशियाना इलाके में रहते है। वे सालों से साइकिल रिक्शा चलाते हैं। उनका कहना है कि जब बैट्री रिक्शा नहीं चलता था, तब ठीक ठाक कमाई हो जाती थी, क्योंकि शहर के भीतर आस-पास के स्थानों तक जाने के लिए साइकिल रिक्शा ही मुख्य साधन होते थे। उनसे बात चीत का दौरान मैंने देखा की कई सवारी कोर्ट से बाहर निकली, उन्होंने ई रिक्शा का इन्तिज़ार किया और रिक्शा आने पर बैठ कर चले गए। मुहम्मद रईस ने उनसे पूछा भी कि “कहाँ जाना है?” तो उन्होंने उनकी बात को अनसुना कर दिया। ज़ाहिर था कि उनको साइकिल रिक्शा से नहीं जाना था।
मुहम्मद रईस ने बताया कि वे कोर्ट के गेट पर अपना रिक्शा लगाते हैं कि यहाँ पुरे दिन में एकाध सवारी मिल जाती है। वे बताते है कि यहाँ से कभी कभी कैसरबाग़, हज़रतगंज, हाई कोर्ट आदि स्थानों की सवारी मिल जाती है। अपनी आमदनी के बारे में बताते हुए वो कहते हैं कि दिन में दो से तीन सौ रुपये ही हो पाते है। मैंने उनसे कहा कि आप बैट्री रिक्शा चलाना क्यों नहीं सीख लेते ? उनका कहना था कि हर काम हर आदमी नहीं कर सकता।
इतनी महंगाई में दो तीन सौ रुपये में मुहम्मद रईस का घर कैसे चलता होगा, मन में ये प्रश्न उठना स्वाभाविक है, लेकिन एक तल्ख़ सच्चाई ये भी है कि समय के साथ खुद को न बदला जाय तो बहुत कुछ पीछे छूट जाता है। बहुत से साइकिल रिक्शा चालकों ने खुद को समय के साथ बदला। अब वे ई रिक्शा चलाते है। साइकिल रिक्शा अब लगभग बीते समय की बात हो गया है।
सड़कों पर सरपट दौड़ती ई-रिक्शा ने इस पारंपरिक परिवहन को हाशिए पर धकेल दिया है। इस बदलाव का सबसे दर्दनाक असर उन गरीब रिक्शा चालकों पर पड़ा है, जिनकी रोजी-रोटी इसी के पहियों से जुड़ी है। एक समय था जब गली-मोहल्लों की तंग गलियों से लेकर मुख्य बाजारों तक साइकिल रिक्शा का बोलबाला था लेकिन आज, रिक्शा चालक दिनभर सवारी के इंतजार में नजरें टिकाए बैठे रहते हैं। घंटों के लंबे इंतजार के बाद भी जब कोई सवारी नहीं मिलती, तो उनके चेहरों पर पसरी मायूसी और दर्द को साफ पढ़ा जा सकता है।
ई-रिक्शा की कम लागत और तेज गति के सामने पैरों के दम पर चलने वाला यह रिक्शा बहुत पीछे छूट गया है। मेहनत दोगुनी होने के बावजूद आमदनी आधी से भी कम हो गई है। साइकिल रिक्शा का लुप्त होना सिर्फ एक सवारी का छूटना नहीं है, बल्कि एक पूरी संस्कृति का दम तोड़ना है।
-मुहम्मद यूसुफ़


