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दास्तां-ए-मीर

ख़ुदा-ए-सुख़न मीर तक़ी मीर उर्दू शायरी के वह आफ़ताब (सूरज) हैं, जिनकी रोशनी से आज भी अदब की महफ़िलें जगमगा रही हैं। सन् 1723 में ‘अकबराबाद’ जिसको आज आगरा कहा जाता है कि सरज़मीं पर पैदा हुए। उन्होंने अपनी ज़िंदगी का एक बड़ा और आख़िरी हिस्सा नवाबों के शहर लखनऊ में गुज़ारा। मीर की शायरी महज़ अलफ़ाज़ का मजमुआ (संग्रह) नहीं है, बल्कि यह इंसानी दिल के टूटने, तन्हाई और वक़्त के थपेड़ों की एक मुकम्मल दास्तान है। उनके कलाम (कविता) में जो सादगी और दर्द है, वह सीधे रूह में उतर जाता है।
मीर ने जिस दौर को देखा, वह दिल्ली की तबाही और इंसानी जज़्बात के बिखरने का दौर था। यही वजह है कि उनकी शायरी में ‘ग़म’ एक स्थायी साथी की तरह नज़र आता है। उन्होंने अपने इस ज़ाती (निजी) और दौर के दर्द को कुछ इस तरह बयां किया:
“पत्ता पत्ता, बूटा बूटा, हाल हमारा जाने है,
जाने न जाने, गुल ही न जाने, बाग़ तो सारा जाने है।”
मीर की सबसे बड़ी ख़ासियत उनकी ज़बान की सादगी थी। उन्होंने आम बोलचाल के शब्दों को शायरी का ऐसा हसीन लिबास पहनाया कि बड़े-बड़े शायर हैरान रह गए। सदियों बाद शहंशाह-ए-ग़ज़ल मिर्ज़ा ग़ालिब को भी यह मानना पड़ा कि मीर का मर्तबा (स्थान) सबसे जुदा है। ग़ालिब ने कहा था:
“रेख़्ता के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो ग़ालिब,
कहते हैं अगले ज़माने में कोई ‘मीर’ भी था।”
मीर की शायरी ज़िंदगी के फलसफे (दर्शन) को बेहद ख़ूबसूरती से समेटती है। वह जानते थे कि यह दुनिया और इंसान का वजूद बेहद नाज़ुक है:
“नाज़ुकी उसके लब की क्या कहिए,
पंखुड़ी एक गुलाब की सी है।”
सन् 1810 में लखनऊ की मिट्टी में हमेशा के लिए सो जाने वाले इस अज़ीम (महान) शायर की कब्र भले ही आज वक़्त की गर्द में कहीं खो गई हो, लेकिन अदब की दुनिया में उनका ‘निशान’ हमेशा कायम रहेगा। जब तक दुनिया में मोहब्बत और दर्द बाक़ी है, मीर का कलाम दिलों पर राज करता रहेगा।

 

निशान-ए-मीर

महान उर्दू शायर मीर तक़ी मीर की याद में लखनऊ में बनाया गया एक प्रतीकात्मक स्मारक (मेमोरियल) है। यह स्मारक उनकी असली कब्र के नष्ट हो जाने के बाद, उनकी स्मृति को सहेजने के लिए बनाया गया था।

निधन के बाद उन्हें ‘अखाड़ा भीम’ नामक कब्रिस्तान में दफनाया गया था। बाद में, ब्रिटिश काल के दौरान जब वहाँ लखनऊ सिटी रेलवे स्टेशन और रेल पटरियों का निर्माण हुआ, तो वह कब्रिस्तान और मीर साहब की मज़ार पूरी तरह नष्ट हो गई। उनकी कोई असली कब्र न बचने के कारण इस स्मारक को एक प्रतीक के रूप में स्थापित किया गया।

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