भारत जैसे बहुभाषी और बहु सांस्कृतिक देश में हिन्दी ने पूरे देश को जोड़ने का काम किया है। भौगोलिक और सांस्कृतिक विविधताओं से भरे और क्षेत्रीय भाषाओं के बहुतायत के बीच हिन्दी संगम का काम कर रही है। अनेक धार्मिक, जातीय, उपजतीय, जनजातीय समूहों की अपनी-अपनी भाषाएं हैं। इसके अलावा दक्षिण भारत में अलग-अलग राज्यों की अपनी भाषाएं हैं।
उत्तर भारत में क्षेत्रीय भाषाओं का प्रभाव है। एक ही राज्य में कई-कई क्षेत्रीय भाषाओं का प्रभाव है। अवधी, भोजपुरी, मैथली, पंजाबी, हरियाणवी आदि। इन सभी भाषाओं पर हिन्दी का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। अगर उत्तर भारत में बोली जाने वाली क्षेत्रीय भाषाओं से हिन्दी को अलग कर दिया जाए तो संभवतः उनका अस्तित्व ही नहीं बचेगा।
आंकड़े बताते हैं कि देश की सत्तर फीसद आबादी हिन्दी भाषी है। दक्षिण भारतीय राज्यों में अलग-अलग भाषाएं हैं। वे आपस में संवाद स्थापित करने के लिए अंग्रेजी या उर्दू का प्रयोग करते हैं, लेकिन अधिकांश लोग हिन्दी बोलते हैं। हिन्दी को राष्ट्रभाषा होने के साथ ही संपर्क की भाषा होने का गौरव हासिल है। एक आंकड़े के अनुसार में भारत में 19 हजार 520 बोलियां बोली जाती है, इसलिए कहा जाता है कि ‘कोस कोस पर पानी बदले चार कोस पर वाणी।’ इन भाषाई विविधता के बीच हिन्दी पूरे देश में आम जनमानस की भाषा बन चुकी है। समय के साथ इसका तेजी से विकास और विस्तार हो रहा है। केन्द्र सरकार की ओर से भी हिन्दी के प्रचार और प्रसार के लिए सराहनीय प्रयास किये जा रहे हैं।
हालांकि बहुत से हिन्दी प्रेमियों की यह शिकायत रही है कि निजी कंपनियों में अंग्रेजी भाषा को प्रमुखता दी जाती है या इंग्लिश मीडियम स्कूलों के कारण लोग आज भी गुलामी की मानसिकता से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। हालांकि उनकी यह चिंता निराधार है। आज हिन्दी जिस स्थान पर है, उसको न तो इंग्लिश मीडियम स्कूलों से कोई खतरा है, न निजी संस्थाओं में बोली जाने वाली अंग्रेजी से।
सरकार की ओर से हिन्दी भाषा के प्रचार, प्रसार और सुधार की नीतियों में कुछ खामियां भी हैं। हिन्दी में ऐसे शब्दावलियों को जोड़ा गया जिनसे भाषा के बनावटी होने का आभास होता है । इसके विपरीत अंग्रेजी भाषा हर साल दुनिया के तमाम भाषाओं के लोक प्रचलित शब्दों को अपने शब्दकोश में समाहित कर लेती है। कठिन, संस्कृत के शब्द या अवैज्ञानिक शब्द किसी भी भाषा के विकास में बाधक होते हैं, हिन्दी को इससे बचाने की जरूरत है। हिन्दी के विकास में कंप्यूटर के लिए संगणक या रेल के लिए लौहपथगामिनी जैसे शब्द बाधक हैं। शब्द ऐसे हो जो भाषा को धाराप्रवाह बनाते हों, उसमें मिठास पैदा करते हों, न कि उसमें बाधा उत्पन्न करते हों।
इतना ज़रूर है कि इस कंप्यूटर के युग में हिन्दी के लिए उन्नत साफ्टवेयर की कमी महसूस होती है। अंग्रेजी और उर्दू भाषा के लिए अच्छे साफ्टवेयर मौजूद हैं, जबकि हिन्दी में इसका अभाव दिखता है। हिन्दी के विकास में हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं की भूमिका की अनदेखी नहीं की जा सकती। हिन्दी को घर-घर पहुंचाने और लोगों के भाषास्तर को सुधारने में हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं की सराहनीय भूमिका रही ही है।
इसके साथ उन्होंने हिन्दी को सरल, सुगम और दूसरी भाषाओं के शब्दों से सजाया भी है। हिन्दी के शब्दकोश में लगभग दो लाख शब्द हैं। अपनी लचरता और उदारता के कारण हिन्दी ने दूसरी भाषाओं के शब्दों को आत्मसात किया है। हिन्दी में बहुत से संस्कृत, उर्दू, फारसी और अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग होता है, यही विशेषता इस भाषा को सुन्दर बनाती है। हिंदी के बारे में प्रख्यात पत्रकार और लेखक ओम थानवी लिखते हैं कि “हिंदी” मूलतः फ़ारसी भाषा का शब्द है।
यहां इस बात का हमेशा ख्याल रखना होगा कि हिन्दी का विकास और विस्तार निरंतर होता रहे इसके लिए इसको ज्यादा उदार और ज्यादा सरल बनाना होगा, वरना संस्कृत की तरह यह भी दम तोड़ देगी। भाषा का अर्थ ही यह होता है कि जिसमें सरलता पूर्वक संवाद स्थापित किया जाए। जो भी भाषाएं इस कसौटी पर खरी नहीं उतरीं लोगों ने उनसे दूरी बना ली।
-मुहम्मद यूसुफ


