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मुसलमानो के साथ राज्य समर्थित हिंसा पर जारी रिपोर्ट को सरकार ने किया खारिज

जिनेवा : जिनेवा स्थित मानवाधिकार संस्थान, एरेट अकादमी ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की है जिसमें भारत के मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ एक दशक से चले आ रहे व्यवस्थित भेदभाव और राज्य समर्थित हिंसा का आरोप लगाया गया है। “असमान नागरिक: भारत में मुसलमानों के खिलाफ व्यवस्थित भेदभाव और मानवाधिकार उल्लंघन, 2014-2025” शीर्षक वाली यह रिपोर्ट मार्च 2026 में जारी की गई । इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सत्ता में आने के बाद की अवधि को शामिल किया गया है और इसे संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद, अंतरराष्ट्रीय गैर सरकारी संगठनों, शैक्षणिक संस्थानों और कानूनी निकायों द्वारा समीक्षा के लिए तैयार किया गया है।

रॉयटर्स द्वारा प्रकाशित इंडिया हेट लैब के आंकड़ों का हवाला देते हुए, रिपोर्ट में 2025 में अल्पसंख्यक विरोधी नफरत भरे भाषणों की 1,318 घटनाओं का उल्लेख किया गया है, जो 2023 में 668 थीं – यानी दो वर्षों में लगभग 97 प्रतिशत की वृद्धि। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2025 की इन घटनाओं में से 1,164 भाजपा शासित राज्यों में हुईं, जिनमें उत्तर प्रदेश का हिस्सा सबसे अधिक है। रिपोर्ट के लेखकों का तर्क है कि भाजपा शासित राज्यों में घटनाओं की अधिकता राजनीतिक बयानबाजी और अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा के बीच संबंध की ओर इशारा करती है।

रिपोर्ट का एक केंद्रीय भाग 2019 के नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) पर केंद्रित है, जिसमें कहा गया है कि यह अधिनियम अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के छह धार्मिक समुदायों को त्वरित नागरिकता प्रक्रिया प्रदान करता है, जबकि मुसलमानों को इससे वंचित रखता है। रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (OHCHR) ने इस कानून को “मौलिक रूप से भेदभावपूर्ण” बताया है, और एमनेस्टी इंटरनेशनल और अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता पर अमेरिकी आयोग (USCIRF) ने भी इसी तरह की चिंताएं व्यक्त की हैं। रिपोर्ट में आगे आंकड़े दिए गए हैं जो दर्शाते हैं कि असम में अंतिम राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर से लगभग 19 लाख लोगों को, जिनमें बंगाली भाषी मुस्लिम अधिक संख्या में हैं, बाहर रखा गया था, जिससे रिपोर्ट के अनुसार राज्यविहीनता का खतरा पैदा हो गया है।

रिपोर्ट में फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई सांप्रदायिक हिंसा पर विशेष ध्यान दिया गया है, जिसमें कम से कम 53 लोग मारे गए थे, जिनमें से अधिकांश मुस्लिम थे। रिपोर्ट में ह्यूमन राइट्स वॉच के दस्तावेज़ों का हवाला दिया गया है। 82 पृष्ठों की ह्यूमन राइट्स वॉच की जांच रिपोर्ट के आधार पर, इसमें आरोप लगाया गया है कि पुलिस अधिकारियों ने मुस्लिम निवासियों पर हुए हमलों में भाग लिया या उन्हें रोकने में विफल रहे और बाद में मुस्लिम कार्यकर्ताओं और पीड़ितों पर मुकदमे चलाए, जबकि हिंसा से पहले भड़काऊ बयान देने वाले अधिकारियों को कोई कानूनी कार्रवाई का सामना नहीं करना पड़ा।

रिपोर्ट में जिन विषयों का सबसे विस्तार से दस्तावेजीकरण किया गया है, उनमें से एक मुस्लिम स्वामित्व वाले घरों और व्यवसायों का विध्वंस है, जिसे भारत में “बुलडोजर न्याय” के रूप में जाना जाता है। हाउसिंग एंड लैंड राइट्स नेटवर्क का हवाला देते हुए, रिपोर्ट में कहा गया है कि अकेले 2022-23 के दौरान 740,000 से अधिक लोग विस्थापित हुए और 150,000 से अधिक घर ध्वस्त किए गए। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने नवंबर 2024 में फैसला सुनाया कि दंडात्मक विध्वंस असंवैधानिक थे, क्योंकि उन्होंने पाया कि वे आश्रय के अधिकार और निर्दोषता की धारणा का उल्लंघन करते हैं।राज्य सरकारों ने इस प्रथा का बचाव करते हुए इसे अनधिकृत निर्माण के खिलाफ कानूनी कार्रवाई बताया है।

भारत सरकार इस अकादमी या इसी तरह के अन्य विदेशी एनजीओ (गैर-सरकारी संगठनों) की ऐसी रिपोर्टों को पूरी तरह से खारिज करती आई है। सरकार का आधिकारिक रुख यह है कि ये रिपोर्ट्स एकतरफा, पूर्वाग्रह से ग्रसित और देश की छवि को नुकसान पहुंचाने के लिए राजनीतिक रूप से प्रेरित होती हैं।

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