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सरकारी दावों की खुली पोल: अस्पतालों के चक्कर काटते-काटते युवक ने तोड़ा दम

लखनऊ : राजधानी लखनऊ के वीआईपी अस्पतालों की दहलीज पर एक बार फिर स्वास्थ्य सिस्टम की संवेदनहीनता के कारण एक गरीब मां की गोद सूनी हो गई। लखीमपुर खीरी से अपने 18 वर्षीय बीमार बेटे हिमांशु को गंभीर हालत में इलाज के लिए लखनऊ लेकर आई एक बेबस मां को चार दिनों तक शहर के बड़े अस्पतालों के चक्कर काटने पड़े। बेड न होने और डॉक्टरों की कथित लापरवाही के कारण समय पर इलाज न मिलने से आखिरकार हिमांशु ने दम तोड़ दिया।

चार दिनों तक चलता रहा ‘रेफर’ करने का खेल। परिजनों से मिली जानकारी के अनुसार, हिमांशु की तबीयत बिगड़ने पर उसे लखीमपुर से लखनऊ रेफर किया गया था। उसकी मां बड़ी उम्मीदों के साथ उसे लेकर राजधानी पहुंची थी, लेकिन यहाँ शुरू हुआ अस्पतालों की संवेदनहीनता का एक ऐसा दौर जिसने युवक की जान ले ली।

परिजन सबसे पहले हिमांशु को लेकर लोहिया संस्थान पहुंचे। आरोप है कि यहाँ डॉक्टरों ने बेड खाली न होने की बात कहकर मरीज को भर्ती करने से मना कर दिया और प्राथमिक उपचार के नाम पर केवल औपचारिकता निभाई।

लोहिया से निराश होकर मां अपने बेटे को लेकर केजीएमयू (ट्रॉमा सेंटर) पहुंची। वहाँ भी स्थिति अलग नहीं थी। स्ट्रेचर और बेड के लिए घंटों इंतजार कराने के बाद डॉक्टरों ने मरीज को किसी अन्य अस्पताल ले जाने की सलाह दे दी।

इसके बाद परिजन बलरामपुर अस्पताल पहुंचे, लेकिन यहाँ भी चार दिनों के भीतर केवल एक से दूसरे वार्ड और एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल दौड़ाने का सिलसिला चलता रहा।बेबस मां का कहना है कि “अगर भर्ती कर लेते तो बच जाता मेरा बच्चा।” मृतक युवक की मां का रो-रोकर बुरा हाल है।

उन्होंने स्वास्थ्य प्रशासन पर सीधे तौर पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए कहा, “हम चार दिनों तक लखनऊ की सड़कों पर ऑटो में अपने बीमार बच्चे को लेकर तड़पते रहे। लोहिया, केजीएमयू और बलरामपुर, हर जगह हाथ-पैर जोड़े, लेकिन किसी डॉक्टर का दिल नहीं पिघला। सबने बेड न होने का बहाना बनाया। अगर किसी एक अस्पताल ने भी उसे समय पर भर्ती कर लिया होता, तो मेरा बेटा आज जिंदा होता।

इस घटना के बाद एक बार फिर लखनऊ के बड़े सरकारी अस्पतालों की आपातकालीन सेवाओं पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मामले के तूल पकड़ने के बाद संबंधित अस्पतालों के कप्तानों (प्रशासकों) ने आंतरिक जांच की बात कही है। स्वास्थ्य विभाग के उच्चाधिकारियों का कहना है कि इस बात की जांच की जा रही है कि मरीज को किस आधार पर लौटाया गया।

यदि आपातकालीन स्थिति थी, तो उसे तुरंत लाइफ-सपोर्ट या होल्डिंग एरिया में क्यों नहीं रखा गया। लोगों में इस बात को लेकर आक्रोश है कि करोड़ों रुपये के बजट के बावजूद गरीब मरीजों को वेंटिलेटर और बेड के लिए एम्बुलेंस में ही दम तोड़ना पड़ रहा है।

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